आजकल  भारत में एक बहस छिड़ी हुई है कि महिलाओं  के लिए आरक्षण होना चाहिए या नहीं,कुछ लोग इसके पक्ष मैं बोल रहे हैं और कुछ इसके विरुद्ध भी हैं। ऐसा लग भी  रहा है कि  महिला आरक्षण कानून पारित होने में अब ज़्यादा समय नहीं  लगेगा। जवाहरलाल नेहरू ने एक बार कहा था कि सिर्फ कानून बनाने से कुछ नहीं हो सकता, स्त्री अथवा पुरूष तब तक आज़ाद नहीं हो सकते जब तक वह  एक दूसरे के आर्थिक प्रधानता के तले दबे हुए हैं।  भारत में आरक्षण देना एक प्रकार से गन्दी राजनीती का हिस्सा बन गया है और इस गंदगी से ज़्यादातर नेता अपना फायदा उठाना चाहते हैं और हम आम लोग भी कोई कसर नही छोड़ते अपने आपको जाती,धर्म आदि के नाम पर तोलने के सिवाय। हमारी सरकार हर समय भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था का हवाल देते हुए अपने उत्तरदायित्व से बचती है पर सच्चाई इसके पूरे विपरीत ही है, गरीब ज़्यादा गरीब हो रहा है और अमीर ज़्यादा  अमीर। देश मैं आज लाखों टन अनाज सड़ रहा है और मेहेंगाई दिन प्रतिदिन  बदती ही जा रही है रही है और पूछने वाला कोई नही है।  भ्रष्टाचार इस समय भारत को धीरे धीरे निगलता जा रहा है और हम इसे कम करने की बजाय व्यवस्था को इसका दोषी मानते हुए,अपने दायित्व से भाग रहे हैं। ऐसी गन्दी प्रणाली की वजह कोई और नहीं  हम ही हैं।

यह तो हो गयी भारत की बात और अब हम बात करते हैं इसके एक राज्य जम्मू कश्मीर की बात। इस राज्य का इतिहास,संस्कृति,सुन्दरता अपने आप में अलग ही मिसाल रखते हैं,एक ऐसा राज्य यहाँ पर फिरंगी भी कब्ज़ा नहीं कर पाए। पर अब इस राज्य की ऐसी दुर्दशा हो चुकी है कि इसको शब्दों मैं बयाँ भी नही किया जा सकता। एक तरफ से पाकिस्तान दीमक कि तरह इसे खाए जा रहा है तो दूसरी तरफ से चीन गुपचुप तरीके से कब्ज़ा किये जा रहा है। और भारत को इससे कोई फिकर नही हैं क्यूंकि हमारे भारत मैं तब तक कुछ नहीं होता जब तक पानी सर के उपर से निकल ना जाये।

अब थोड़ी सी बात यहाँ पर होने वाली राजनीती की भी बात करते हैं,कांग्रेस जो की केंद्र मैं रहते हुए नारी सशक्तिकरण का नारा देती है वहीँ दूसरी तरफ राज्य में पीडीपी और नेकां से हाथ मिला कर एक ऐसा घिनोना विधेयक पारित करती है जिसे कोई सपने में भी नही सोच सकता की क्या वाकई हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। धर्माधारित क्षेत्रिय भेदभाव तो इस राज्य की नीयति बन चुका है मगर अब लिंगाधारित नागरिक भेदभाव भी मुंह उठा के खड़ा हो चूका है। इस विधेयक के खिलाफ कुछ आवाजें उठने भी लगी हैं,पर वो एक विशेष समुदाय तक ही सिमित रही हैं,फेसबुक पर इस विधेयक के खिलाफ काफी ज़ोर शोर से आवाज़ उठाई जा रही है पर वो इसे एक विहेश समुदाय तक ही सिमित रखे हुए हैं। क्या डोगरा,गोजरी,लदाखी आदि को अपने आतम सम्मान की कोई चिंता नहीं है? क्या हम लोग, खासकर मैं यहाँ डोगरों को ललकारना चाहूँगा क्यूंकि वो इस राज्य का दूसरा सबसे बड़ा समुदाय है जो इस विधेयक के खिलाफ कुछ भी नही बोल रहा। और यह कितने ही शर्म की बात है आजकल हम लोग पैसे को ज्यादा इज्ज़त देने लग गये हैं चाहे हमारा आतम सम्मान ही क्यूँ ना दाव पर लग जाये। क्या आज पैसा इतनी महतवपूर्ण ज़रिया बन गया है कि इसके अलावा हमने कुछ देखना ही बंद कर दिया है?

कल यही सवाल मैंने किसी से पूछा था की तुम्हारे लिए क्या ज़्यादा महत्व रखता है और उसका जवाब उल्टा मेरी ही तरफ था की, “अभी तुम्हें घर वाले खिला रहे हैं इसलिए तुम्हें  पैसे की इज्ज़त नहीं पता”।

जो भी कुछ लोग इसे पड़ रहे हैं मेरा उनसे सिर्फ एक ही प्रशन है कि क्या आज की दुनिया में आतम सम्मान ज़्यादा मायने रखता है या फिर पैसा?,ये सवाल खासकर मैं जम्मुवासियों से पूछना चाहता हूँ ?

साथ ही मैं एक बात सपष्ट कर देना चाहता हूँ की मेरे इस प्रशन का बिल्कुल भी ऐसा मतलब ना निकला जाये की मेरे कहने का मतलब है सिर्फ इज्ज़त कमाओ,पैसा नहीं। मैं तो बस इतना जानना चाहता हूँ कि क्या पैसा कमाने के लिए हम अपने सम्मान को दाव पे लगा दे? हम लोग अक्सर देखते हैं की डोगरा,लद्दाखी अक्सर ऐसा इलज़ाम लगते हैं की कश्मीरी नेता हमारे साथ भेदभाव करते हैं,कभी किसी ने इसकी वजह जानने  की कोशिश की?

“नहीं“,क्यूंकि हम सबको पता है इस भेदभाव के लिए ओर कोई नहीं सिर्फ हम खुद ही ज़िम्मेवार हैं।

कुछ लोग अक्सर मेरे पर आरोप लगाते हैं कि मुझे सिर्फ ब्लॉग लिखने  आते हैं और जब मुझे हक़ीक़त में यह सब करना पड़ेगा तो ही असलियत का एहसास होगा,क्यूंकि ब्लॉग तो कोई भी लिख सकता है।
अगर ब्लॉग लिखना इतना ही आसान होता तो जम्मू में ब्लॉग लिखने वालों कि इतनी कम संख्या नहीं  होती।

मेरा ब्लॉग लिखने का एक ही लक्ष्य है कि मैं अपने जम्मू की दबी हुई आवाज़ को सबके सामने रख सकूँ चाहे सामने वाला मुझे कितनी ही गालियाँ क्यूँ ना दे।
यह मैं करता रहूँगा जब तक मुझे मेरा लक्ष्य नहीं  प्राप्त हो जाता है पर मैं तुम जैसे लोगों कि तरह अपने आतम सम्मान से ज़्यादा प्राथमिकता नहीं दूंगा, साथ ही मैं तुम लोगों की तरह system  को दोषी मानने के बजाय हम सब को दोषी ठहराऊंगा और अगर मेरी इस सोच से  किसी को कोई समस्या है तो मैं कुछ नहीं  कर सकता।
मैं  अपने भारत देश से बाकि देशों से ज़्यादा प्यार करता हूँ कारणवश मुझे पूरा अधिकार है कि मैं अपने देश (bharat) और अपनी मातृभूमि (जम्मू) की निरंतर आलोचना और प्रशंशा करूँ।

I know I am very rude in my last few statements,but few  word of some  Jammuities hurt me a lot like money matters more than self-respect,I can do anything for publicity(and the article:-Debut entry in Blog world written by some Abhyudhay,about whom I dont know much is also some fakie person created by me).

अगर अपनी आवाज़ रखना एक Publicity stunt कहलाता है तो हाँ मैं ज़रूर ऐसी publicity करता रहूँगा चाहे तुम्हें कितनी ही तकलीफ क्यूँ न हो।

As Sidhu says,”No one one dares to kick a dead dog.”

Someone has rightly said,“When we judge or criticize another person, it says nothing about that person; it merely says something about our own need to be critical.

One more,”All of us could take a lesson from the weather. It pays no attention to criticism.”

जार्ज  विलिअम्स ने एक बार कहा था,”A man’s country is not a certain area of land, of mountains, rivers, and woods, but it is a principle and patriotism is loyalty to that principle.

जाते  जाते एक छोटी सी कहानी सुनाता चलूँ :-

  • एक बार एक मछुआरा नदी किनारे बैठा हुआ मछलियाँ पकड़ रहा था और उसी समय वहां पर एक अमीर आदमी आया और कुछ देर तक उस मछुआरे को कुछ दुरी से ध्यान से देखता रहा। एक घंटे बाद जब मछुआरा अपना कम समाप्त कर जाने लगा तो वह अमीर आदमी उसके पास आया और पूछा की इतनी जल्दी क्यूँ जा रहे हो ?
  • मछुआरे ने जवाब दिया की मैंने एक घंटे में इतनी मछलियाँ पकड़ ली हैं की मेरा एक हफ्ता आराम से गुज़र जायेगा और अब मैं घर जा रहा हूँ ताकि में अपने परिवार के साथ कुछ समय व्यतीत कर सकूँ।
  • आदमी:-तुम और भी मछलियाँ पकड़ सकते हो अभी पूरा दिन बाकि है जिससे तुम कुछ और कमाई कर सकते हो सकते हो और खुद की एक नाव और खुद के नौकर चाकर भी रख सकते थे और खुद आराम करो।
  • मछुआरा :- इससे मुझे क्या हासिल होगा ?
  • आदमी:- अच्छा खासा पैसा कमाने के बाद तुम कुछ आदमी काम पर रख सकते हो और यह काम कोई भी चला सकता है तुम्हारी अनुपस्थिति में और साथ ही में तुम पैसा कमाने का कोई ओर ज़रिया भी अपना सकते हो,जिससे तुम्हारे पास कमाने का एक ओर साधन हो जायेगा।
  • मछुआरा:- नमस्ते! में चलता हूँ अब। और जो मुझे ज़िन्दगी में चाहिए वो मैं कर ही रहा हूँ।
Moral of the story is:-

Sometimes we get so caught up in producing, achieving and becoming successful, that we may never stop to ask, “What is life all about? What am I really living for?”

मैं आशा करता हूँ की मेरी कुछ बातों से किसी के दिल को ठेस न पहुंचे पर जो मेरे दिल में था तो वो मैंने कुछ अक्षरों मैं लिख दिया।
हिंदी में मैंने काफी सालों बाद कुछ लिखने का प्रयत्न किया  है,अगर किसी को कोई गलती नज़र आती है तो उसे कृपया कर मेरे ध्यान में ज़रूर लायें।

धन्यवाद!